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स्तनपान: जीवन की बेहतर शुरुआत
Pushplata Singh IAS, Commissioner, ICDS MP
31 Jul 2017 17 32 48
Breastfeeding
 बचपन बहुत अनमोल है, और यह पूरे जीवन का आधार भी है लेकिन हमारे प्रदेश में हर साल हजारों बच्चे पहले साल में ही कुपोषण के शिकार हो जाते हैं। इससे बच्चों के पूरे जीवन के विकास पर गहरा असर पड़ता है। गत् 10-15 सालों में जो नई बात इस विषय पर सामने आई है वो यह है कि अगर पहले 1000 दिन यानि गर्भावस्था से लेकर बच्चे के जन्म उपरांत दूसरे जन्मदिन तक अगर बच्चे के आहार और पालन-पोषण के सही तरीके अपनाये जाएं, तो बच्चा स्वस्थ रहता है और स्वस्थ बचपन ही जीवन की नींव है। जितनी सुदृढ़ नींव होती है, उतनी ही पक्की इमारत बनती है। जीवन की नींव बनने की शुरूआत तो माँ के गर्भ से ही हो जाती है और इसीलिए वहीं से ही बच्चे को अच्छे पोषण एवं देखभाल की आवश्यकता होती है। यह प्रकृति का नियम है कि माँ के गर्भ में बच्चे का पूरा पोषण माँ से मिलता है और जन्म के 6 माह तक माँ के दूध से ही उसे पूरा पोषण मिलता है, इसीलिये कहते है कि बच्चे के जन्म के तुरंत बाद माँ के दूध पिलाना शुरू कर दें और छः माह तक केवल माँ का दूध दें। छः माह पूर्ण होने पर माँ के दूध के साथ-साथ ऊपरी भोजन देने की शुरूआत और फिर उम्र के अनुसार भोजन दें, यही है स्तनपान और शिशु एवं बाल आहार व्यवहार के चार स्तम्भ, जिसपर बच्चे का स्वस्थ बचपन एवं पूरा जीवन निर्भर है।

हम जानते हैं कि माँ का दूध हर बच्चे का अधिकार है और नवजात शिशु का तो पहला टीकाकरण भी है। बच्चे के लिए यह जीवन रक्षक है। बच्चे के शारीरिक, मानसिक एवं बौद्धिक विकास हेतु उसे जन्म के तुरन्त बाद से छः माह तक उसे केवल माँ का दूध ही दिया जाना चाहिए।

माँ का दूध जीवन रक्षक है। शोध बताते हैं कि जन्म से एक घण्टे के भीतर स्तनपान शुरू कराके जीवन के पहले ही महीने में होने वाली 5 में से 1 बाल मृत्यु रोकी जा सकती है। लेन्सेट 2003 के अनुसार जन्म के तुरंत बाद माँ के दूध की शुरूआत कराने से लगभग 22 प्रतिशत नवजात शिशुओं को बचाया जा सकता है। लेन्सेट ब्रेस्ट फीडिंग सीरीज़ 2016 के अनुसार स्तनपान करने वाले 5 वर्ष तक के बच्चों में डायरिया के खतरे को 54 प्रतिशत एवं श्वसन रोग को 32 प्रतिशत तक कम किया जा सकता है।

मध्यप्रदेश में NFHS-4 के अनुसार जन्म के तुरन्त बाद स्तनपान कराने का प्रतिशत 34.5 मात्र है, जबकि संस्थागत प्रसव का प्रतिशत 80.8 है। छः माह तक केवल स्तनपान कराने का प्रतिशत 58.2 मात्र है। 6 से 8 माह के दौरान ऊपरी आहार की शुरूआत कराने का प्रतिशत 38.1 हैं। यदि हम ध्यान से देखें तो प्रदेश में आय.वाय.सी.एफ व्यवहारों संबंधी सूचकांक चिंताजनक हैं।

हम सब जानते हैं कि हर कोई चाहता है कि उसका बच्चा पूरी तरह स्वस्थ्य, तंदरूस्त रहे, परन्तु बच्चों की देखभाल संबंधी उनके व्यवहार, आदतें गलत होने के कारण ऐसा होता नही है, जैसे- कुछ भ्रांतियों की वजह से बच्चे को जन्म के तुरन्त बाद माँ का पहला गाढ़ा दूध, जो कि अमृत समान होता है, नहीं देना या फिर जन्म से लेकर छः माह तक केवल स्तनपान भी नहीं कराना। कभी-कभी कुछ कारणों से छः माह तक बच्चे को माँ का दूध नहीं मिल पाता और ऐसे में उसे ऊपर का दूध या समय पूर्व आहार की शुरूआत करा दी जाती है। सार्वजनिक स्थानों जैसे बस स्टेण्ड आदि पर जहां लंबे समय तक यात्री प्रतिक्षारत रहते हैं वहां शिशुओं को आवश्यकता होने पर भी मातायें उन्हें स्तनपान कराने में असुविधा महसूस करती हैं। असुविधा की दृष्टि से शिशु को लंबे समय तक माँ का दूध उपलब्ध नहीं हो पाता है और वह कहीं न कहीं कुपोषण का शिकार होते हैं और उनका जीवन खतरे में आ सकता है। इससे बच्चे के सही शारीरिक एवं मानसिक विकास पर विपरीत प्रभाव पड़ता है और दस्त जैसे खतरे बढ़ जाते हैं।

बच्चों से सीधे सरोकार रखने वाला हमारा विभाग इस हेतु जागरूकता लाने एवं समाज को सकारात्मक बनाने के लिए लगातार प्रयासरत है। हर वर्ष 1 से 7 अगस्त तक पूरे प्रदेश में विश्व स्तनपान सप्ताह एवं 1 से 7 सितम्बर के दौरान राष्ट्रीय पोषण सप्ताह का आयोजन किया जाता है। इसमें राज्य से लेकर आँगनवाड़ी स्तर तक विभिन्न गतिविधियों का आयोजन कर वातावरण निर्माण किया जाता है। स्कूल, कालेज में छात्र-छात्राओं, जनप्रतिनिधियों, मीडिया आदि को जागरूक कर उन्हें भी अभियान में शामिल किया जाता है। प्रदेश के 97 हजार आँगनवाड़ी केन्द्र जनसमुदाय में जन्म से लेकर छः माह तक केवल स्तनपान और 6 माह के बाद ऊपरी आहार की शुरूआत के संदेश को विभिन्न तरीकों से पहुँचाते हैं। सार्वजनिक स्थानों पर प्रतीक्षा करते समय माताओं को स्तनपान कराने में होने वाली असुविधा से बचने के लिए सार्वजनिक स्थानों पर पृथक से महिलाओं के लिए एक सुविधा कक्ष आँचल कक्ष (ब्रेस्ट फीडिंग कार्नर) बनाये जा रहे हैं। बस स्टेण्ड, रेलवे स्टेशन, कलेक्टर कार्यालय आदि में जनसहयोग से लगभग 600 आँचल कक्ष (ब्रेस्ट फीडिंग कार्नर) बनाये गए हैं। बसो में भी एक सीट इस हेतु आरक्षित की जा रही हैं।

माह के प्रथम मंगलवार को आँगनवाड़ी केन्द्र में गोद भराई कार्यक्रम में सभी गर्भवती महिलाओं को संस्थागत प्रसव, स्तनपान तथा शिशु एवं बाल आहार व्यवहारों की महत्ता के बारे में समझाईश देकर उनकी शंका समाधान करने हेतु प्रयास किए जाते हैं। दूसरे मंगलवार को अन्नप्राशन का आयोजन कर ऊपरी आहार की शुरूआत के महत्व के बारे में बताया जाता है, साथ ही छः माह पूर्ण करने वाले बच्चे को खीर खिलाकर बच्चे का अन्नप्राशन समुदाय के सहभागिता से समुदाय के समक्ष किया जाता है।

स्तनपान और शिशु एवं बाल आहार व्यवहार को बढ़ावा देना एक महत्वपूर्ण और चुनौतियों भरा कदम है। प्रदेश के बच्चे स्वस्थ हों, सुपोषित हों, इसके लिए जरूरी है कि माँ, परिवार एवं समुदाय को स्तनपान और शिशु एवं बाल आहार व्यवहार के बारे में सही और पूरी जानकारी हो। इस जिम्मेदारी को पूरा करने में आप सब की विशेष भूमिका हैं। आप सब जो ये ब्लॉग पढ़ रहे है, को जागरूक बनना होगा। आपके जागरूक होने से आप आपके घर, गली, गाँव, शहर, प्रदेश एवं पूरे देश के कई बच्चों को एक स्वस्थ जीवन की शुरुआत दे सकते हैं।

हम सब मिलकर कोशिश करें कि हर माँ के मन में यह बात बैठ जाए कि बच्चे को जन्म के तुरंत बाद दूध पिलाने से, छः माह तक केवल अपना ही दूध पिलाने से और छः माह पूर्ण होने पर अपने दूध के साथ-साथ ऊपरी भोजन देने से बच्चे को स्वास्थ्य और सुपोषित रखा जा सकता है, जो सिर्फ उसके ही हाथ में है। बच्चे के सम्पूर्ण विकास के लिए माँ द्वारा लिया गया यह एक सर्वश्रेष्ठ कदम होगा। इन बच्चों के स्वस्थ रहने से देश समृद्ध एवं विकसित होगा, जो कि देश के लिए आपका एक महत्वपूर्ण योगदान होगा।
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